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Friday, 6 October 2017

छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के (चम्पाकली - १९५७)

छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के (चम्पाकली - १९५७)
संगीतकार : हेमंत कुमार
गीतकार : राजिंदर कृष्ण
गायक: लता मंगेशकर

छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के ।
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के ।।
छुप गया ...
आज हैं सूनी सूनी, दिल की ये गलियाँ ।
बन गईं काँटे मेरी, खुशियों की कलियाँ ।।
प्यार भी खोया मैने, सब कुछ हार के ।
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के ।।
छुप गया ...

अँखियों से नींद गई, मनवा से चैन रे ।
छुप छुप रोए मेरे, खोए खोए नैन रे ।।
हाय यही तो मेरे, दिन थे सिंगार के ।
दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के ।।
छुप गया ...

Thursday, 5 October 2017

वृद्धावस्‍था

                     वृद्धावस्‍था  
    
  वृद्धावस्‍था कोई रोग नही है ,यह जीवन की सच्‍चाई है , परन्‍तु वृद्धावस्‍था मे कई प्रकार की समस्‍यायें आने लगती है । वैसे तो वृद्धावस्‍था को कोई टाल नही सकता परन्‍तु वृद्धावस्‍था में होने वाली कई समस्‍याओं का निराकरण होम्‍योपैथिक औषधियों से किया जा सकता है क्‍यो‍कि होम्‍योपैथिक एक लक्षण विधान चिकित्‍सा पद्धति है ।
     विटामिन सी और ई ये उम्र बढने की प्रक्रिया को रोकते है और इन्‍हे प्राकृतिक स्‍त्रोंतों से प्राप्‍त किया जाना चाहिये पोष्टिक तत्‍व बी -12 लौह फोलिक एसिड और तॉबा जैसे खनिज त्‍वचा की कोशिकाओं में रक्‍त आपूर्ति के लिये आवश्‍यक है इन्‍हे खजिजो से प्राप्‍त होने के स्‍त्रोंत सब्जिया अनाज मटर दुध मेवे फलिया आदि में पाया जाता है । 
0-समस्‍त शारीरिक प्रणाली का दोषपूर्ण होना(एम्‍ब्राग्रीसिया):- उन वृद्ध व्‍यक्तियों की महान औषधि है जिनकी समस्‍त शारीरिक प्रणालीयॉ दोषपूर्ण हो गयी हो एंव जो दुर्बलताओं से घिरे हो दुबले पतले युवक या दुबली पतली स्त्रीयॉ जो जवानी में ही बुढापे जैसी अवस्‍था में पहूंच जाती है 50 वर्ष की उम्र में 70 वर्ष की लगती हो बच्‍चे जो बूढे से लगे उनके अंगों में कमजोरी के कारण कॅपन ,विचार शक्ति की कमी वृद्ध लोगों में स्‍नायु दौर्बल्‍य हतोत्‍साह ,चक्‍कर आना ,घरेलू या मानसिक ,व्‍यापारिक हानि के कारण रात में सो नही सकता इसके रोगी को पीडित अंगों में पसीना आता है 
0-बुढापे की क्षीणता (बैराईटा कार्ब):- वैसे तो बैराईटा कार्ब दवा को मूर्खो की औषधिय कहॉ जाता है ,परन्‍तु रोग लक्षणों के अनुसार यह दवा वृद्धावस्‍था में होने वाली कई समस्‍याओं के निराकरण की एक अच्‍छी दवा है ,परन्‍तु इसका प्रयोग लक्षणनुसार ही करना उचित है । बुढापे की क्षीणता रोकने में भी इसके उपयोग की अनुशंसा कुछ चिकित्‍सकों ने की है परन्‍तु होम्‍योपैथिक में इसकी अन्‍य औषधियॉ भी है इसलिये लक्षणानुसार ही औषधियों का चयन किया जाना उचित है ।
समय से पहले बुढापा (बेसिलस) :- कुछ चिकित्‍सकों का अभिमत है कि समय से पहले बुढापे को रोकने के लिये बेसिलस दबा का प्रयोग किया जा सकता है । परन्‍तु हमारा अभिमत है कि इस दवा को प्रयोग करने से पहले लक्षणों का मिलान आवश्‍यक है ।
शरीर में सिलवटे पडना(सार्सपैरिला) :- वृद्ध मनुष्‍यों की भॉती शरीर के चमडे में सिलवटे पड जाना इसमें शरीर की अपेक्षा गर्दन अधिक पतली पड जाया करती है
लैपिस ऐल्‍बा - शरीर की चरबी क्षय होती है इस क्षय के साथ आयोडम की तरह जबरजस्‍त भूंख भी होती है लैपिस अन्‍य दवाओं की अपेक्षा जल्‍दी फायदा करती है ।
थियोसिनामीनम (रोडैलिन) थियोसिनेमाईन (2 एक्‍स प्रति दिन 1 ग्राम) :- यह दवा शरीर के कठोर तन्‍तुओं को हल करके उसमें लचक पैदा करती है । वृद्धावस्‍था में लचक न होने का परिणाम है जितनी लचक होगी उतनी ही जवानी होगी ।वैसे तो वृद्धावस्‍था को कोई टाल नही सकता । परन्‍तु औषधि से शरीर के तंतुओं का कडा पड जाने से कुछ न कुछ रोका जा सकता है । इस लिये नाडियों के कडेपन ऑखो के मोतिया बिन्‍द ऑखों की कार्निया की अस्‍वच्‍छता आदि के लिये यह उपयोगी है डॉ0 ए एस हार्ड का कहना है कि यह वृद्धावस्‍था के लिये उपयोगी है  उसे कुछ पीछे धकेल देती है (डॉ0 सत्‍ रोग तथा हो0 चि0) मेरूरज्‍जा के क्षय रोग कान में पीप होकर बहरा हो जाना ,कान की छोटी हडडी का संचालन बन्‍द हो जाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है । डॉ0 हार्ड के अनुसार यह दवा बुढापे को रोकती है
मेफाईटिस :- डॉ0 फैरिगटन लिखते है कि इस दबा का स्‍नायु संस्‍थान पर विशेष प्रभाव होता है जब व्‍यक्ति अत्‍यन्‍त शक्तिहीन हो गया हो तब निम्‍न शक्ति में देने से यह स्‍नायु संस्‍थान के लिये टॉनिक का काम करती है और शाक्तिहीनता को दूर करती है ।
आर्टिका यूरेन्‍स क्‍यू :- इस दवा के सेवन से वृद्धावस्‍था में नवीन बल का संचार होता है और मनुष्‍य कई वर्ष तक अधिक जी सकता है ।
लाईकोपोडियम 30- इसे वृद्ध पुरूषों की महौषधि कहॉ जाता है । जब धीरे धीर क्षीणता बढती जाये तब इस औषधिय का प्रयोग करना चाहिये ।
फॉसफोरस शरीर में लोच कम होती जाये तब फॉसफोरस 30 देना चाहिये इस औषधिय की एक मात्रा सप्‍ताह में लेते रहने से जकडन कम हो जाती है । जिससे आयु बढ जाती है या कष्‍ट कम हो जाता है ।
समय से पहले बुढापा (ब्‍यूफो) :- समय से पहले बुढापा (बोरिक)
वृद्धजनों के थकने पर हाईड्रेस्टिक :- वयोवृद्ध जो सरलतापूर्वक थक जाने वाले लोग क्षीणकाय एंव दुर्बल व्‍यक्तियों के लिये हाईड्रैस्टिक विशेष रूप से लाभदायी है ।
संजीवनी शक्ति को प्रबल एंव मानसिक शारीरिक विकास हेतु  (एक्‍स रे) :- (एक्‍स रे 12 एक्‍स इससे भी उच्‍च्‍ शक्ति में) :- यह शारीरिक व मानसिक शक्ति को बढाती है और संजीवनी शक्ति को बल प्रदान करती है (डॉधोष )
डॉ0 बोरिक ने लिखा है कि इसमें कोशिका चयापचय उत्‍तेजित करने का गुण है मन तथा शरीर की प्रतिक्रियात्‍मक जैवी शक्ति को जागृत करती है दबे हुऐ लक्षणों को भीतर से बाहर लाती है विशेष रूप से उन लक्षणों को जो प्रमेह विष जनित तथा मिश्र संक्रमणों से उत्‍पन्‍न होते है
स्‍मरण शक्ति ( बैराईटा कार्ब ) :- वृद्धों की स्‍मरण शक्ति धटने पर बैराईटा कार्व एंव युवकों की स्‍मरण शक्ति घटने पर एनाकार्डियम दवा का प्रयोग करना चाहिये
जिनसेग  :-जिनसेंग को एरेलिया क्‍वीनकिफोलिया नाम से जाना जाता है ।इसे चमात्‍कारी जड के रूप में मान्‍यता मिली है कहते है इसका प्रतिदिन सेवन करने पर बुढापा बहुत देर से आता है । प्रख्‍यात लेखक खुशवन्‍त सिंह प्रतिदिन जिनसेंग का सेवन किया करते थे । हाथ सदा ठण्‍डा रहे कम्‍पन्‍न सुन्‍न अॅगुलियॉ सफेद कम उम्र में बुढापे के लक्षण जिनसेंग की प्रधान क्रिया स्‍थल रीड की मज्‍जा का निम्‍नाश है शरीर के नीचे का भाग वात से शुन्‍न हो जाता है पैर के तलबे सुन्‍न हो जाते है व अॅगूठे में तेज र्दद रहता है ।
वृद्धावस्‍था में कैल्‍केरिया कार्ब :- वृद्धावस्‍था में कैल्‍केरिया कार्ब दवा का उपयोग बार बार अधिक दिनों तक नही करना चाहिये (डॉ0बोरिक)
वृद्धावस्‍था की शिकायतो की महत्‍वपूर्ण दबा (कैल्‍केरिया फलोर) - वृद्धावस्‍था में चमडी में झुरूरीयॉ ,बालों का झडना, ऑखों की दृष्टि का घटते जाना ,सुनने की क्षमता कम होना ,दॉतों की दतंवेष्‍ट का कमजोर होना आदि शिकायतों पर बायोकेमिक औषधि कैल्‍केरिया फलोर का प्रयोग किया जाता है । चूंकि इस दवा के प्रयोग से वृद्धावस्‍था की कई शिकायतों का हल हो जाता है परन्‍तु इसके लम्‍बे समय तक प्रयोग करने से पथरी की शिकायत होने की संभावना बढ जाती है अत: इस दबा का प्रयोग कम शक्ति में अधिक लम्‍बे समय तक नही करना चाहिये इसकी होम्‍योपैथिक 30 शक्ति का प्रयोग कुछ समय छोड छोड कर लम्‍बे अंतराल से करना उचति है ।
डॉ0 डी पी रस्‍तोगी :- वृद्धावस्‍था में अब्‍सेन्‍ट माईन्‍ड की दशा में कोनियम,लाईकोपोडियम,अमोनियम कार्ब उपयोगी है ।
वृद्धावस्‍था में बच्‍चों जैसा व्‍यवहार करना (बैराईटा कार्ब) :- यदि वृद्धावस्‍था में बच्‍चों जैसा व्‍यवहार करने लगे तो बैराईटा कार्ब का प्रयोग करना चाहिये ।
सुनाई देने में परेशानी कम सुनाई देना :- वृद्धावस्‍था में यदि सुनाई देने में दिक्‍कत आ रही हो तो साईक्‍यूटा ,मैगकार्ब,पेट्रोलियम ,बैराईटाकार्ब ,फासफोरस दबाओ का उपयोग करना चाहिये ।
    
   डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल
    बी0एच0एम0एस0
दिशा मानसिक विकलांग केन्‍द्र
हीरो हॉडा शोरूम के पास बण्‍डा रोड
 मकरोनिया सागर म0प्र0






H:\B C-2017-18\Homeopathic\वृद्धावस्‍था लेख डॉ0सत्‍यम.doc

Wednesday, 28 December 2016

शराबी

                                 शराबी
         
हिन्‍दी शब्‍दों व व्‍याकरण का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण शब्‍दों के उधेडबुन का दु:साहस शायद मुक्ष में इसलिये भी न था कि कही शब्‍द विन्‍यासों की श्रृखला में कोई ऐसा अर्थहीन रंग न भर जाये कि सारी रचना ही परिहास का करण बन जाये, इसलिये कभी कभी मन के भावों को कागज में उतारने के प्रयासों में कई बार असफल हो जाता हूं ।
   मन के विचारों को किसी कथा या रचना में बांधना कितना कठिन कार्य है, यह तो एक रचनाकार ही बतला सकता है । हमारे आस पास ही कितनी घटनायें कथा कहानियॉ बिखरी पडी रहती है, और हम जीवन की यर्थाथ सच्‍चाई से कितने अनभिज्ञ बने अपनी कल्‍पनाओं के पात्र व घटनाओं को सूत्रों में बाधने के प्रयासों में कभी कभी सच्‍चाई व मौलिकता से इतना दूर होते चले जाते है कि कभी कभी कहानियों की घटनाओं व पात्रों में वह स्‍वाभाविकता की सौंधी गंध नही होती, जो यर्थाथ घटनाओं की स्‍वाभाविकता में हुआ करती है । एक लम्‍बे समय से किसी कहानियों की घटनाओं को बुनने के असफल प्रयासों में कभी कभी घटनायें अपनी स्‍वाभाविकता खो देती है , तो कभी कभी कथा के पात्र मूल कथा कहानी से दूर होते चले जाते है ।
 विधि के विधान को कौन बदल सकता था , कालचक्र के क्रूर पहिये सुख दुख ,मिलन ,बिछोर लिये निरंतर धूमते रहे । अपने नाम के विरूद्ध सजा काटते सुखीलाल की अवस्‍था पूरे पचास वर्ष के आस पास हो चली थी , विगत कई वषों से मृत्‍यु दण्‍ड की सजा जो उच्‍च न्‍यायालय के आदेशों से अजन्‍म कारावास की सजा में बदल गई थी ,भुगत रहे थे । इस काल कोठरी में कैसे बसन्‍त आई ,कब सावन बरसा ,होली दिवाली कब आई और चली गयी कुछ पता न चलता , यदि कुछ था तो केवल इतना कि सुबह जेल की घंटी के साथ उठना ,कैदीयों के साथ सामूहिक सुबह के कार्यों से निर्वत होकर कैदियों की कतार में खडे होकर जेल अधिकारीयों के आदेशों का पालन करते करते पूरा दिन बीत जाता , फिर रात होती ,फिर सुबह होती चली जाती , बस यू ही जिन्‍दगी बीतती गई ।
न दिन अपना था ,न रात ,न जीवन अपना था , न मन से कुछ कर सकते थे ।
   कब सुखीलाल चौबे को शराब की बुरी लत लगी ,यह तो उस करमजले को भी शायद मालूम न था । यदि कुछ याद था भी , तो इस अभागे करमजले को अपने अतीत के पश्‍चाताप भरी यादे जिसे सुनातें हुऐ सुखीलाल को अपने कर्मों पर ऐसा पस्‍तावा होता जिसकी भरपाई शायद इस जन्‍म में तो शायद संभव न थी । जीवन का जो पल बीत गया जिसे नशे की बुरे व्‍यसन में पड अपने दुष्‍कमों से खो दिया उसकी पूर्ति तो शायद अब इस जन्‍म में होना संभव न थी ।
  सुखी की शादी आज से 25 30 वर्ष पहले हुई थी नयी नवेली दुल्‍हन जाने क्‍या क्‍या अरमान लेकर ममता का आंचल , बाबूल का घर छोड ,अपनी गली चौराहे ,अपना  अंगना भूलकर सुखी के साथ जीवन संगनी बन गृहस्‍थ जीवन में प्रवेश किया था । सुखी लाल किसी आफिस में बाबू थे । शादी के प्रारम्‍भ के दो तीन वर्ष तो व्‍याप्‍त अभावों व अल्‍प वेतन में भी अच्‍छे से गुजरते गये । परन्‍तु एक लम्‍बी अवधी तक यह दाम्‍पत्‍य बच्‍चों की किल्‍कोरियों से अनभिज्ञ रहा ,सुखीलाल भी आफिस से देर घर आने लगे ,कभी कभी तो शराब के नशे में इतने ध्रुत आते कि आफिस के मित्र इन्‍हे पकड कर लाते , समय बीतता रहा ,पत्‍नी रत्‍ना एक सुशील सीधी साधी गृहणी थी । जिसने कभी पति के अच्‍छे बुरे कामों पर अनावश्‍यक हस्‍ताक्षेप नही किया था । सुखी एक उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त महत्‍वाकाक्षी पेशाई नौकरी वाले परिवार के युवक थे , जब कोई अच्‍छी नौकरी न मिली तो हिम्‍मत हारकर ,बाबूगिरी की नौकरी कर ली परन्‍तु मानसिक रूप से वे परेशान रहते ,उनकी इस मानसिकता की वजह से पत्‍नी रत्‍ना भी परेशान रहती ,परन्‍तु दोनो के विचारों में जमीन आसमान का अन्‍तर था , एक को साहित्‍य से लगाव था, उच्‍च महत्‍वाकांक्षाये थी ,वही सीधी साधी इस गृहणी को न उच्‍च महत्‍वाकांक्षा थी न ही अनावश्‍यक मानसिक तनाव को लेकर जीवन बिताना पसंद था । अत: रत्‍ना इस अल्‍पवेतन में ही गृहस्‍थी की गाडी को किसी न किसी तरह से खींच ही लेती थी । वही सुखीलाल को भविष्‍य में कुछ कर गुजरने की चाह ने उसके वर्तमान को नरक बना डाला था ,शायद इसमें उन दोनो प्राणीयों की गलतीयॉ न थी । क्‍योंकि यदि इन दोनों के जीवन व मानसिकता का विश्‍लेषण किया जाये तो वस्‍तु स्थिति साफ हो जाती है । उच्‍च महत्‍वाकांक्षायें कभी कभी इन्‍सान के दु:ख का मूल कारण बनती है
सुखी के साथ भी यही था ,सुखीलाल साहित्‍यानुरागी थे , साहित्‍य संसार में हमेशा डुबे रहते ,परन्‍तु आज के इस व्‍यवसायीक साहित्‍यक प्रतिस्‍पृद्ध में जहॉ पाठकवर्ग से लेकर प्रकाशक वर्ग के मुंह ऐसे सस्‍ते साहित्‍यों का बजार गरम था ,जिसने स्‍वस्‍थ्‍य साहित्‍यों के प्रकाशन पर एक प्रश्‍न चिन्‍ह लगा दिया था ,आखिरकार प्रकाशक घाटे का सौदा क्‍यों करे उसे भी तो व्‍यापार करना है ,फिर कथा ,कहानीयों से वह वाही अवश्‍य मिल जाये ,परन्‍तु सच्‍चाई तो यही है कि इससे घर नही चलता । सुखीलाल के प्रयास निरर्थक साबित होते रहे , निरंतर असफलताओं के बोझ तले दबे सुखीलाल मानसिक रूप से अस्‍वस्‍थ्‍य होते जा रहे थे ।
शराब के  नशे में कभी कभी सुखीलाल शैतान बन जाते तोड फोड करते तो कभी स्‍वंयम अपनी किस्‍मत को कोसते रहते ,आज भी सुखीलाल शराब पीकर लौटे रात्री के नौ बजे थे ,दरवाजे के खटखटाते ही उनकी धर्मपत्‍नी जो पति के नशे में आने के पदचापों व आदतों से परिचित हो चुकी थी , दरवाजा खोला
 रत्‍ना को शराब पी कर आने पर आपत्ति न थी, परन्‍तु यदि कोई शिकायत थी तो वह यह कि शराब के नशे में बको मत,  जैसी ही लडखडाते हुऐ सुखीलाल ने कदम अन्‍दर बढाया पत्‍नी ने हाथ पकड लिया साहित्‍यानुरागी इस संवेदनशील शराबी को यह बरदास्‍त न हुआ ,कि कोई नशे में भी उसे सहारा दे ,सुखी ने हाथ छुडाते हुऐ, जोर से पत्‍नी को एक तरफ धक्‍का देते हुऐ कहॉ , चल हट मुक्षे सहारा देती है ।
 हॉ चलो अब सो जाओ,    पत्‍नी ने सहज व स्‍वाभाविक ढंग से कहॉ था ।
  अरे हरामजादी भूंखा ही सो जाऊ, चल खाना निकाल ।
पत्‍नी ने किसी प्रकार का जबाब देना उचित न समक्षा और खाना लगा दिया सुखीराम खना कम ,मुहॅ ज्‍यादा चला रहे थे ,और अपने कमाऊ पुरूष होने का अहसास, सीधी साधी पत्‍नी को जताते जाते ।
 तू क्‍या जाने ? अरे देखना मै बाबू ही नही मरूगां , मै कुछ कर के ही मरूगा , मगर तूम लोग ,क्‍या समक्षों बेबकूफ लोग, तुम्‍हारी जिन्‍दगी तो खाना और सोना है ,कहॉ जिये कब मर गये किसी को पता भी नही चलेगा ।
 पत्‍नी गऊ थी , कुछ न कहती ,क्‍योकि वह जानती थी कि शराब के नशे में यदि कुछ कह दो तो समान तोडते ,मारते पीटते ,बेचारी कई बार पिट चुकी थी ,मगर धन्‍य है भारत की नारी व हमारे भारतीय संस्‍कार जिसने कभी पति का विरोध न किया , सुखीलाल खा पी कर सो जाते ।
 दूसरे दिन उन्‍हे स्‍वयंम इस बात पर दु:ख होता, शराब पीने पर उनकी आत्‍मा उन्‍हे दुत्‍कारती थी ,वे शराबी भी न थे ,मगर संग सौबत में जब एक बार पी ली फिर उन्‍हे कहॉ होश रहता । सामानों के टूटने फूटने का जितना गम उन्‍हे नही रहता ,जितना शराब पीने व पीकर बेजुबान पत्‍नी पर अत्‍याचार ,बर्बता का बर्ताव करने का होता था ।
 रत्‍ना ने निसंतान पॉच वर्ष तो काट दिये थे , इसी मध्‍य उनका स्‍थानान्‍तरण अपने गृह नगर हो गया । परिवार से लडकर अलग हुऐ इन पति पत्‍नी ने अलग ही रहना उचित समक्षा व अलग किराये से रहने लगे । बर पक्ष व पडोसियों द्वारा नि:संतान होने का ताना शायद रत्‍ना बरदांस्‍त भी कर लेती परन्‍तु रत्‍ना स्‍वंय एक स्‍त्री थी और पति के होते हुऐ नि:संतान होने का दु:ख अब वह न सहन कर सकी ,ममता कब जागी इस लोह नारी के शरीर में, जिसने पति देव के इतने जुल्‍म सह कर भी कभी ऊफ न की, वह आत्‍म हत्‍या का विचार करने लगी ,पति से जब यह बात कहती तो पति को भी अपने नि:संतान होने पर दु:ख होने लगता दोनो पति पत्‍नी आपस में समक्षौता कर लेते और जीवन की गाडी पुन: अभावों में चल पडती । सुखी एक महत्‍वाकाक्षी युवक थे, उनका विचार था ,जीते तो सभी है परन्‍तु कुछ कर के अपने अन्‍दाज में जीना ही जीवन है । वे रात भर बडे बडे साहित्‍यो का अध्‍ययन करते लिखते । रत्‍ना को कभी कभी उनके इस साहित्‍यानुराग एंव लेखन कार्य से धृणा होने लगती और वह विरोध कर उठती,
 अब सो भी जाओं ।
 सुखीलाल निरंतर असफलताओं के थपेडे खाते खाते मानसिक तनाव के शिकार हो चूंके थे इस तनाव ने उनके मास्तिष्‍क पर मानसिक व्‍याधि का घर जमा लिया था । उनको किसी का इस प्रकार से टोकना भी अब अच्‍छा न लगता था , और वे विद्रोह कर उठते ,यहॉ तक कि वे किताब काफीयॉ फेंक देते व कभी कभी तो पत्‍नी को मार पीट भी देते ,बेचारी पत्‍नी रो धोकर सो जाती , समय बीतता गया व इस नि:संतान दम्‍पति के यहॉ एक सुन्‍दर कन्‍या का जन्‍म हुआ । कुछ समय पश्‍चात पुन: इस घर में किलकोरियॉ गूंजी, इस बार एक सुन्‍दर पुत्र का जन्‍म हुआ । पति पत्‍नी अपने दोनो बच्‍चों की बाल क्रिडाओं का पूरा आनन्‍द लेने लगे जीवन की गाडी पटरी पर आ चुंकी थी । परन्‍तु होनी को कौन टाल सकता था ,एक दिन शराब के नशे में इतने धुर्त आये, सुखीलाल कि उन्‍हे यह भी ख्‍याल न रहा कि घर में दो दो छोटे छोटे बच्‍चे है, आते साथ ही बुरी बुरी गालीयॉ ससुराल पक्ष को देने लगे , पत्‍नी के विरोध करने पर सामान तोडने फोडने लगे ,पत्‍नी भी उनकी इन आदतों से परेशान हो चुकी थी कुछ दिनो से रत्‍ना में भी चिडचिडापन आते जा रहा था , सुखीलाल ने चिल्‍लाते हुऐ कहॉ मेरी कमाई है, मै सब चीजों को तोड दूंगा ,क्‍या तुम्‍हारे बाप ने कमाया है , कि तुम्‍हारे दहेज का है ,होनी को कौन टाल सकता था पलंग पर दोनो बच्‍चे सो रहे थे , सामानों के टुटने के टुकड बच्‍ंचे के सिर में जा लगा ,रत्‍ना सब बर्दास्‍त कर सकती थी ,परन्‍तु मॉ की ममता बच्‍चों का दु:ख न सह सकी ,रोते हुऐ कहॉ देखो दीपू को लग गई है खून, निकल रहा है । अब क्‍या था सुखी ने खून से लथपथ रोते हुऐ बच्‍चे को डाटना शुरू किया व मारने दौडे रत्‍ना ने पति का गला पकड ढकेल दिया, शराबी पति के स्‍वाभिमान को ढेस पहुची ,वो शराब के नशे में तो था ही जमीन पर जा गिरा , रत्‍ना जैसी कोमल सहनशील नारी ने पति के भावीक्रोध के परिणामों को भांप लिया था और इस शंका से कि पुन: उठ कर ये बच्‍चों पर हमला न कर दे रत्‍ना ने चिल्‍लाते हुऐ, पति की छाती पर बैठ कर उन्‍हे रोकने का असफल प्रयास किया ,सुखी को पत्‍नी का यह व्‍यवहार अपमानजनक लगा उसने जैसे ही अपने बचाव के उपक्रम में अपने हाथ का भरपूर मुक्‍का पत्‍नी के मुंह पर दे मारा रत्‍ना की शक्ति व पकड जैसे ही कम हुई ,सुखी ने उठते ही यह विचार कर कि मै पति हूं इसे अपनी कमाई खिलाता हूं ,मानसिक संताप के दबे हुऐ ज्‍वालामुखी में शराब ने उत्‍प्रेरक का कार्य किया वही पत्‍नी के हाथों अपने स्‍वाभिमान को लुटते देख इस साहित्‍यानुरागी संवेदनशील व्‍यक्‍ित जो कलम का उपासक था जाने किस दुष्‍टशक्ति या र्दुभाग्‍य के वशीभूत होकर अपनी पत्‍नी को खून से लथपथ बेहोश हालत में बडबडाते हुऐ, किचिन से गैस की रबड खीच दी ,रबड के खिचते ही गैस स्‍वतंत्र होकर अपने तीब्र बेग से पूरे कमरे में भ्‍ार गयी थी, सुखी ने क्रोधावेश में गैस तो खोल दी थी, परन्‍तु वे घटना को टालते या इस अप्रिय घटना के विषय में कुछ विचार करते गैस ने अपनी स्‍वाभाविकता का ऐसा परिचय दिया कि गैस जाने कब बिजली के किसी तार से टकराई और देखते ही देखते एक धमाके में सब कुछ राख हो गया था , सुखी दरवाजे पर थे इस लिये धमाके के साथ बाहर जा गिरे, परन्‍तु दोनों बच्‍चे व पत्‍नी पूरी तरह से झुलस गयी , आग इतनी भीषण थी की बुझाना संभव न था , सब कुछ जल कर राख हो गया था, पत्‍नी दोनों बच्‍चे इस अभागे के दुष्‍कर्मो के कारण असमय ही काल कलवित हो गये थे ।
 सुखी दिल के बुरे न थे मगर जैसे ही होश आया सब कुछ लुट चूका था , कुछ शेष न था चाहते भी तो जो धटना घट चुकी है उसकी पूर्ति इस जनम में न कर सकते थे, पागलों की तरह से चिल्‍लते हुऐ,   ये क्‍या हो गया !  कभी पत्‍ती के जले शरीर से लिपटते, तो कभी बच्‍चों के जले शरीर को छाती से चिपका कर विलाप करते , परन्‍तु अब रोने से क्‍या होना था जो होना था वो तो हो चुका था । पागलों की तरह रत्‍ना के जले शरीर से लिपट कर चिल्‍लते ,रत्‍ना तू गऊ थी ,मै कभी तुक्षे सुख न दे सका ,मै कितना स्‍वार्थी था, अपना अपना ही सोचता रहा, अपना नाम, कुछ कर गुजरने की स्‍वार्थ भावना,  
पडौसियों के प्रयासों से सुखी को अलग किया, शेष आंग पर काबू कर सुखी को बाहर लाये समक्षने का प्रयास भी किया, परन्‍तु पडोसियों के मन मे सुखी के इस र्बताव के प्रति धृणा थी, पुलिस को किसी ने फोन किया , पुलिस बेरहमी से उसे थाने ले गई आज सुखीलाल इसी अपराध की सजा काट रहे थे !

                                            कृष्‍णभूषण सिंह चन्‍देल
                                             म0न082 गोपालगंज
                                             सागर मध्‍यप्रदेश
                                          फो0 9926436304
                       krishnsinghchandel@gmail.com

  

Monday, 19 December 2016

-: अब तो फि़जांओं में :-

             -: अब तो फि़जांओं में :-


   अब तो फ़‍िज़ओं में, वो मस्तीयॉ कहॉ ।

   जहॉ देखो, बिरानी ही बिरानी छॉई है ॥

    हुस्न के चहरे ब़ेंजान से हो गये ।

              हर जव़ा दिलों पर उदासी, सी छॉई है ।

            कॉफूर हो चला, खुशीयों का आलम ।

            हर ज़ज़बादों में, बिमारी सी छॉई है ।।

               मैंख़ानों में रोज, मेले लगते ।    

           इब़ाद्दगाहों में, खांमोंशी सी छॉई हैं ।।    

            अब तो फ़‍िज़ओं में, वो मस्तीयॉ कहॉ ।

           जहॉ देखो, बिरानी ही बिरानी छॉई है ॥

                मदरसों में, अब ताल़ीम नही ,
            हर ज़ज़बादों, हर जुबानों में ।
            अब सियासी,  चालें छॉई है ॥

          नफ़रत सी हो चली है दुनिया से ,
       हर श़क्‍स के, चहरों पर खुदगजीं सी छॉई है ॥

        बदलते वक्त ऐ आलम, का मिजाज तो देखों ।

            इंसान की क्या,कुदरत ने भी, 

          रंग बदलने की कसम सी खाई है ॥ 

         अब तों फि़जओं में, वो मस्तीयॉ कहॉ । 

          जहॉ देखों बिरानी ही बिरानी छॉई है ॥ 

          बुर्जुगों से भी अब कायदा नही । 

     जांम से जांम टकराने, की तहजीब आई है !!

           किसे कहते हों तुम इसान , 

            यहॉ तो कपडों की तरह , 

          बदलते रिस्तों की बॉढ सीं आई है ॥ 

          हम अपनी ही पहचान भूल गये
              गली कूचों से घरों तक,
            अब नंगी तसवीरें छांई हैं । 

          दूंसरों की तहजीब को गले लगाते

           उन पर बरबादींयों, की शांमत आई है

           अब तो फि़जओ मे, वो मस्तीयॉ कहॉ ।

           जहॉ देखो, बिरानी ही बिरानी छॉई है ॥
                  कृष्ण सिंह चंदेल सागर                 

                 मो0 - 9926436304
         krishnsinghchandel@gmail.com



Thursday, 6 October 2016

मोटापा क्‍या है इसका निदान प्राकृतिक एंव एक्‍युपंचर तथा चीनीशॉग उपचार से

                      मोटापा/सेल्‍युलाईट

         
    सेल्‍युलाइट वसा कोशिकाओं की परते होती है , ये त्‍वचा के नीचे पाये जाने वाले उन ऊतकों में पायी जाती है ,जो अन्‍य ऊतकों व अंगों को सहारा देती है और जोडती है । यह वसा अधिकतर महिलाओं के जांधो व नितम्‍बों पर जमा होती है । इसमें त्‍वचा एकदम संतरे के छिलके की तरह खुरदरी दिखाई देती है ।अतरिक्‍त चर्बी और सेल्‍युलाई का सीधा सम्‍बन्‍ध होता है,इसमें बढी हुई वसा कोशिकायें संयोजक ऊतकों पर दबाब बनाती है ,इससे त्‍वचा कोमल दिखायी नही देती है । संयोजक ऊतक  (कलेक्टिव) के बीच की परत को मुलायम व लचीला बनाये रखने के लिये बायों फलेबनाईडस और विटामिन सी  लाभदायक होते है । विशेषज्ञों का मानना है कि शरीर में मौजूद टाक्‍सीन के कारण ऐसा होता है ,लेकिन यह भी देखा गया है कि महिलाओं के कनेक्‍टव टिश्‍यू पुरूषों के मुकाबले काफी दृढ होते है । इसलिये जैसे जैसे महिलाओं का बजन बढता जाता है । कोशिकायें फैलती जाती है ऐसी स्थिति में ये ऊतक की ओर यानी त्‍वचा की ऊपरी परत की तरफ फैलती जाती है ,जिससे त्‍वचा एकदम संतरे के छिलके जैसी दिखलाई देती है । पुरूषों में अकसर बसा का जमाव जांधों पर कम ही देखने को मिलता है । क्‍योकि उनकी बाहरी त्‍वचा काफी मोटी होती है । जिससे स्‍पष्‍ट तौर पर त्‍वचा के नीचे कितना वसा जमा हो रहा है ,इसका पता नही चलता ,लेकिन सेल्‍यूलाईट के पीछे मूल कारण अभी भी विशेषज्ञों के लिये कौतुक का विषय बना हुआ है ।  

     अक्‍सर रक्‍त संचार  इस्‍ट्रजन  बढ जाने के कारण संयोजन ऊतक कमजोर हो जाते है और बॉटर रिटेशन की समस्‍या बढ जाती है । जिस के कारण चर्बी शरीर में जमा होने लगती है ,लसीका प्रवाह ठीक रहे,इसके लिये नियमित व्‍यायाम करना आवश्‍यक है । यदि ऐसा न किया जाये तो निष्‍कासन ठीक से नही हो पाता है ,और जरूरत से ज्‍यादा पानी के कारण त्‍वचा फूल जाती है जिससे रक्‍त ऊतकों तक नही पहुच पाता है । और फ्री रेडिकल्‍स निष्‍कासित नही हो पाते है । अन्‍य बसा या बसा कोशिकाओं की तरह सेल्‍युलाईट फैट भी कम कैलोरी वाला भोजन करने से प्रभावित होता है और इससे शरीर के वसा में कमी आती है लेकिन वसा धटान के बाबजूद फैट सेल्‍स मोजूद रहते है ,और कैलोरी लेने पर तुरन्‍त बढ जाते है । इसलिये सेल्‍यूलाईट को सर्जरी द्वारा खत्‍म करने की सलाह डाक्‍टर दिया करते है ।वैज्ञानिकों का ऐसा भी मानना है कि ,बिना सर्जरी के सैल्‍युलाईट का उपचार संभव नही है ।परन्‍तु अन्‍य वैकल्‍पिक उपचारको का मानना है कि ऐसे ऊतकों व टाक्‍सीन को शरीर की मेटाबोलिक दर व ऊर्जा की खपत को बढाकर कम किया जा सकता है । फैट सेल्‍स जो शरीर में मौजूद है ,उनकी जानकारी को यदि भुला दिया जाये व सेल्‍स के बीच बचे फ्रीरेडिकल्‍स टाक्‍सीन तथा अव्‍यर्थ पदार्थो को यदि शरीर से निकाल दिया जाये तो इस प्रकार की समस्‍या से छुटकारा पाया जा सकता है। इसीलिये चिकित्‍सक योगा व कसरत आदि करने की सलाह देते है ,शरीर व कोशिकाओं के मेटाबोलिक दर व ऊर्जा खपत को बढाकर शरीर से अव्‍यर्थ पदार्थो को निकाला जा सकता है ।
     एन्‍टी आक्‍सीडेंटस हमारे शरीर का फ्रिरेडिकल्‍स से बचाव करता है । एन्‍टी आक्‍सीडेंटस विटामिंस एंजाईम्‍स व हर्बल एक्‍सटैक्‍ट्रस होते है । इसमें विटामिन सी ,विटामिन ई और बीटा कैरोटीन प्रमुख है । ये ताजे फलों सब्‍जीयों जडी बूटीयों आदि में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है । शरीर का रक्‍त संचार ठीक से हो इसके लिये आवश्‍यक है कि रक्‍त संचार को ठीक करने के प्राकृतिक उपाय एव बॉडी की मिसाज, या बॉडी ब्रश भी इसके लिय उपयोगी है । हल्‍के हल्‍के मुलायम ब्रश से बॉडी की मिसाज करने से या असेंशियल आलय से त्‍वचा को माईश्‍चराईज करने से रक्‍त संचार उचित तरिके से होता है । ब्‍युटी क्‍लीनिक में बी गम मिसाज से भी रक्‍त संचार को उचित तरीके से कम किया जा सकता है । चीन की परम्‍परागत एक उपचार विधि है जिसे ची नी शॉग कहते है । मोटापा कम करने में आज कल इसका उपयोग समृद्धसील राष्‍ट्रों में काफी उत्‍साह के साथ किया जा रहा है चूंकि इसके परिणाम काफी आशानुरूप रहे है । इस उपचार विधि का एक और लाभ यह है कि इसमें मोटापे को घटाने के लिये पेट का मिसाज किया जाता है । इससे पेट के अंतरिक महत्‍पूर्ण अंग जिनका उत्‍तदायीत्‍व हमारे शरीर के पाचन तंत्र को उचित तरीके से कार्य लेना है । ची नी शॉग उपचार से पेट के अंतरिक अंग मजबूत होते है एंव मेटाबोलिक की दर को बढाकर अनावश्‍क चर्बी को आशानुरूप कम किया जाता है । चीनी शॉग उपचार से हमारे शरीर की प्रिरेडिकल्‍स एंव टाक्‍सीन आसानी से निकल जाती है इससे त्‍वचा पर झुरूरीया नही पडती साथ ही त्‍वचा स्निग्‍ध मुलाय हो जाती है । ची नी शॉग उपचार से हमारे शरीर की सर्विसिंग हो जाती है ।  प्राकृतिक उपायों में रसेदार भोजन व ताजे फल तथा अधिक पानी पीने एंव व्‍यायाम ,योगा आदि कर शरीर की ऊर्जा व मेटाबोलिक दर को बढायें ताकि शरीर से अव्‍यर्थ पदार्थ बाहर निकल जायें । मॉस पेशियों के अधिक इस्‍तेमाल से रक्‍त व लसिका सर्कुलेशन ठीक रहता है इससे पसीना अधिक आता है त्‍वचा डीटाक्सिफाई होती है एंव चर्बी कम हो जाती है ।    
    अरोमाथैरेपी :- मोटापा घटाने या कम करने में अरोमाथैरेपी के आयल भी उपयोगी है । मिसाज के लिये रोजमेरी फेनल ,असेशियल आयल में दो तीन बूद थोडा सा बादाम का तेल मिलाकर इसे मेन नर्व जो शरीर व अंगों के मध्‍य लाईन पर मौजूद होते है इसे इस्‍टूमुलेट (उत्‍तेजित) करने से शरीर व कोशिकाओं के मेटाबोलिक दर व ऊर्जा की खपत बढती है  एंव शरीर से अत्‍याधिक पसीना निकलता है । इससे शरीर का टॉक्सिन पानी पसीने के माध्‍यम से बाहर आने लगता है जो कि शरीर का मोटापा कर करता है । पेट पर मोटापा कम करने एंव चबी घटाने के प्रमुख छै: पाईन्‍ट है । जिसका विवरण एक्‍युपंचर चिकित्‍सा में किया गया है । मोटापा कम करने व चर्बी को घटाने एंव मेटाबोलिक दर को बढाने के ये छै: प्रमुख बिन्‍दू है जिसका प्रयोग एक्‍युपंचर ,नेवल एक्‍युपंचर के साथ ची नी शॉग उपचार तथा एक्‍युप्रेशन चिकित्‍सा पद्धतियों के साथ मिसाज थैरापी में किया जाता है । उक्‍त पाईन्‍ट सम्‍पूर्ण शरीर के मोटर नर्व को कवर करते है ,इसीलिये यंत्र निर्माताओं ने मोटापा कम करने व नर्व को इस्‍टुमूलेट करने हेतु कुछ इस प्रकार के यंत्र करने हेतु कुछ इस प्रकार के यंत्रों का निर्माण किया है जिसमें उक्‍त पाईन्‍ट को दबाब देने व स्‍टुमूलेट करने की व्‍यवस्‍था रहती जैसे बटर फलाई एड ,स्‍लीम सोना बेल्‍ट आदि ,बटर फलाई तितली के आकार का छोटा सा यंत्र होता है इसमें पेट पर चिपका देते है इसके स्‍वीच को चालू करने से मशीन में बायबरेशन होता है यह बायबरेशन प्रमुख नर्व केन्‍द्र को उत्‍तेजित करते है इससे शरीर में ऊर्जा की खपत बढती है व शरीर के टाक्‍सीन पसीने के द्वारा बाहर निकलने लगते है । शरीर के इस प्रमुख बिन्‍दूओं को इस्‍टीमुलेट करने के कई तरीके प्रचलन में है ।  
एन्‍टी आक्‍सीडेंटस :- एन्‍टी आक्‍सीडेंटस हमारे शरीर को फ्री रेडिकल्‍स से बचाव करता है ,फ्री रेडिकल्‍स एक ऐसा तत्‍व है ,जो शरीर के कोशिकाओं के आक्‍सीकरण क्रिया के बाद बेकार (अव्‍यर्थ पदार्थ) बचा रहता है । शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इसे शरीर से बाहर निकालने का प्रयास करती रहती है ,परन्‍तु इसके बाद भी फ्रीरेडिकल्‍स शरीर में बच रहते है ,इनके जमने से शरीर की अन्‍य कोशिकाओं के कार्यो में अनावश्‍यक अवरोध उत्‍पन्‍न होता है ,मृत सेल्‍स शरीर से बाहर नही निकल पाते ,नये सेल्‍स का निमार्ण अवरूद्ध हो जाता है इससे अन्‍य व्‍यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर नही निकल पाते । वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी फ्रीरेडिकल्‍स की वजह से वृद्धावस्‍था होती है । त्‍वचा व मॉसमेशियों में झुरूरीयॉ उत्‍पन्‍न होने लगती है । एण्‍टी आक्‍सीडेंटस को रोका जा सकता है ,सैल्‍युलाईट ट्रीटमेन्‍ट से मॉसपेशियों में जमने बाले ब्‍यर्थ पदार्थो व फ्रीरेडिकल्‍स को बाहर निकालने की कई प्राकृतिक विधियॉ प्रचलन में है । सौंर्द्धय उपचार में इनका प्रयोग सदियों से होता आया है कुछ लोगों में यह गलत धारण है कि सैल्‍युलाईट उपचार से केवल मोटापा कम किया जाता है । परन्‍तु ऐसा नही है कि इसका उपचार से त्‍वचा का ढीलापन उसकी झुरूरीयॉ तथा त्‍वचा की स्‍वाभाविकता को लम्‍बे समय तक कायम रखा जा सकता है ।                                            
  

1-मोटापा कर करे हेतु स्‍टो0-25 पांईट:-
 एक्‍युपंचर एंव नेवल एक्‍युपंचर उपचार में मोटापा कम करने एंव पेट की अनावश्‍य चर्बी को कम करने के लिये एस0टी0-25 पांईट का प्रयोग किया जाता है । एक्‍युपेशर उपचार में भी इस पाईट पर गहरा अतिगहरा दबाब देकर पेट का मोटापा या चर्बी को कम किया जाता है ।


  2-मोटापा कम करने केे पांच एक्‍युपंचर पाईंट:-
 मोटापे का कारण शरीर के कुछ हिस्‍सों में विशेष कर ऐसे हिस्‍सो में अधिक होता है जहॉ पर शरीर से कम काम लिया जाता है । जैसे पेट ,जांध कुल्‍हे आदि परन्‍तु कुछ व्‍यक्तियो में मोटापा सम्‍पूर्ण शरीर में होता है । एक्‍युपंचर में मोटापे को कम करने ऐवम चबी को घटाने के लिये निम्‍न पाईट पर एक्‍युपंचर पाईन्‍ट पर पंचरिग कर उचित परिणाम प्राप्‍त किया जा सकता है । वैसे यह नेवल एक्‍युपंचर चिकित्‍सा में प्रयोग किये जाने वाला पाईट है ।




इस चित्र को ध्‍यान से देखिये इसमें क्रमाक 1 से 6 तक के पाईट है यही है मोटापा व शरीर से अनावश्‍यक चर्बी को कम करने के पाईन्‍ट क्रमाक 1,2,5,6 यह रिन चैनल पर पाये जाने वाले पाईट है ।
पाईन्‍ट नम्‍बर -1 यह नाभी या रिन-8 से डेढ चुन नीचे रिन चैनल पर पाई जाती है यहां पर रिन -6 पाईन्‍ट होता है
पाईन्‍ट नम्‍बर -2 यह रिन-5 बिन्‍दू है इसकी दूरी नाभी से दो चुन नीचे रिन चैनल पर होती है ।
पाईन्‍ट नम्‍बर -3 इसकी दुरी पाईन्‍ट नम्‍बर 2 से दो चुन आडी रेखा में दोनो तरफ होती है जहॉ पर स्‍टोमक-27 पाईन्‍ट पाया जाता है ।
पाईन्‍ट नम्‍बर-4 इसी स्थिति रिन-8 बिन्‍दू या नाभी मध्‍य से दो चुन की दूरी में आडी रेखा में दोनो तरफ होती है । जहॉ पर स्‍टो-25 पाईन्‍ट होता है ।
पाईन्‍ट नम्‍बर-5 यह बिन्‍दू नाभी या रिन-8 पाईन्‍ट से एक चुन रिन चैनल पर ऊपर की तरफ होती है जहॉ पर रिन-9 पाईन्‍ट होता है ।
पाईन्‍ट नम्‍बर-6 यह बिन्‍दू नाभी या रिन-8 पाईन्‍ट से चार चुन ऊपर रिन चैनल पर पाई जाती है जहॉ पर रिन- 12 पाईन्‍ट होता है ।
 उक्‍त छै: पाईन्‍टस पर पंचरिग कर मोटापे को कम किया जाता है । होम्‍योपंचर उपचार में लक्षणों को ध्‍यान में रख कर उक्‍त पाईट पर होम्‍योपैथिक की शक्तिकृत औषधियों का उपयोग किया जाता है । एक्‍युप्रेशर चिकित्‍सा एंव ची नी शॉग उपचार में उक्‍त पाईट पर दबाब व मिसाज तकनीकी से उपचार कर मोटापे को कम किया जाता है ।


Tuesday, 16 February 2016

Chamtkar (Manoyog) मनोयोग एक चमत्कर है जीवन मे उन्नति ,बचो का मन पढ़ने मे ना लगना,जीवन मे असफलता आदि को ईस विधा से दूर हो सकती है

                              मनोयोग एक चमत्कार है ,
  जीवन मे उन्नति ,बच्चो का मन पढ़ने मे ना लगना, जीवन मे असफलता 
आदि को इस विधा से दूर किया जा सकता है ।
http://krishnsinghchandel.blogspot.in                
           
               मनोयोग एक चमत्‍कार
                                
          आप अपने जीवन में जो कुछ भी पाना चाहते है ,सब कुछ आप प्राप्‍त कर सकते है । इसमें कोई सन्‍देह नही है न ही यह कोई जादू या चमत्‍कार है । आप की लगन व महनत आप को वो सब कुछ दिला सकता है जिसकी आप को चाहत है ।कुदरत की दिखने वाली अव्‍यवस्‍थ रचना में भी एक व्‍यवस्‍था है । जैसें आप चटटानों को ही देखे , इसमें भी एक व्‍यवस्‍था है फूल पत्‍ते ,तितलियों के पंख, आदि पर गौर करे तो आप पायेगे कि इनकी बनावट व रंगों आदि में एक क्रम एकरूपता जैसी व्‍यवस्‍था है । जैसे फूलों की पॅखुडियॉ एक क्रम से ऊपर की तरफ बढती है फिर नीचे की तरु छोटी व एक सी होती जाती है रंग भी इसी प्रकार होते है ,तितलीयों के पॅखो की बनावट आकार प्रकार व रगों में भी आप को एक क्रम व एकरूपता मिलेगी ,अर्थात कहने का अभिप्राय यह है कि कुदरत की रचना में एक सुनिश्चित व्‍यवस्‍था है ।यह तो एक मात्र भौतिक वस्‍तुओं का उदाहरण था ।  अब देखे हमारे आकाश गंगा में लाखों करोडों की संख्‍या में हमारी पृथ्‍वी से भी बडे बडे गृह है । जो एक दूसरे की परिक्रमा कर रहे है व एक दूसरे के आकृषण बल की वजह से खुले आकाश में स्थित है । गृहों का अपनी परिधी में एक दूसरे गृहों का चक्‍कर लगाने से मौसम बदलते है तथा प्राकृतिक का संतुलन बना रहता है कल्‍पना करे यदि हमारी पृथ्‍वी जो सूर्य की परिक्रमा करती है ,यदि बन्‍द कर दे तो क्‍या होगा ? या फिर अपनी आकृषण शक्ति का दुरूपयोग कर सूर्य के निकट पहुंच जाये तो क्‍या होगा ?  यदि ऐसा हुआ तो पृथ्‍वी पर जीवन का अन्‍त हो जायेगा । आकाश गंगा में दिखने वाले सभी गृह एक निश्चित व सुनियोजित कार्यो को अनावृत सदियों से बिना रूके करते चले आ रहे है ।  अब आप पूंछ सकते है आखिर ऐसा क्‍यों ?
तो इसका जबाब है ,इन सभी के पास अपने अपने कार्यो की सूचनायें संगृहित है इसी प्रकार का एक और उदाहरण है जिसे बतला देने से स्थिति और भी साफ हो जायेगी । जब बच्‍चा पैदा होता है तब उसके विकास को ही देखे तो आप देखेगे कि शरीर के समस्‍त अंग एक निश्चित क्रम में विकसित होते चले जाते है  जैसे बत्‍तीस दॉत है जिनमें से आगे के कुछ दॉतों की बनावट अलग है तो उसका विकास उसी क्रम में होगा हाथ या पैरों के विकास के समय क्‍या हम कभी डाक्‍टर के पास जा कर क्‍या पूंछते है कि डॉ0 सहाब देखे कि हमारे बच्‍चे के हाथ पैरों का बराबर एक सा विकास हो रहा है या नही ऐसा इसलिये चूंकि शरीर के समस्‍त अंग अपने अपने हिसाब से विकसित होते है एंसा नही है कि एक हाथ बडा हो जाये एंव दूसरा छोटा रह जाये या किडनी बडी हो जाये हिद्रय छोटा रह जाये । सभी अंग अपनी अपनी आवश्‍यकतानुसार विकसित होते रहते है ।  कहने का अर्थ है किसी भी प्राणी का विकास अपने आप होते रहता है । वैज्ञानिक समुदाय के पास इसका जबाब है । प्रत्‍येक प्राणीयों की कोशिकाओं के पास एक संदेश होता है उसे मालुम होता है कि उसे क्‍या करना है तथा वह अपने सन्‍देश का पालन बिना चूंके करता है इसी का परिणाम है कि प्राणीयों का विकास उसकी आवश्‍यकता के अनुसार होता रहता है उपरोक्‍त उदाहरणों में एक भौतिक निमार्ण व संरचना आदि के विषय में चर्चा की गयी है । दूसरे उदाहरण में बस्‍तुओं में संसूचना जिसे वैज्ञानिक समुदाय जीवित प्राणियों के विकास में इनफरमेशन संगृहण को उत्‍तरदायी मानता है । यही सूचना हमारे अध्‍यात्‍म से मिलती जुलती है हम सभी जीवित या अजीवित वस्‍तुओं में एक सूचना संगृहित होती है और उसी सूचना का परिणाम है कि जीवित अजीवित सभी वस्‍तुयें अपना अस्‍तीत्‍व बनाये हुऐ एक निश्चित समय तक विकासित होते है ,जीवित रहते है । यदि यह सूचना न हो तो किसी भी वस्‍तु का विकास एंव उसका अस्तित्‍व संभव नही है ।      यह सूचना एक तो प्राकृतिक प्रदत होती है एंव दूसरी संसूचना को प्राणी स्‍वयं अपनी आवश्‍यकता के अनुसार अर्जित करता है । प्राकृतिक प्रदत सूचना प्राणीयों के जीवित रहने उसके विकास तथा अन्‍त के लिये जबाबदार होती है अर्थात उत्‍पति व अन्‍त के लिये उनमें सूचनायें होती है जैसाकि हम सभी प्राय: इस बात को अच्‍छी तरह से जानते है कि किसी प्राणी की उम्र कितनी है । प्राकृतिक प्रदत सूचना प्राणीयों की उत्‍पति विकास व अन्‍त (मृत्‍यु) की सूचनायें संगृहित रखता है । अर्जित सूचना प्राणी स्‍ंवयम अर्जित करता है इसे हमारे धर्म शास्‍त्रों में ज्ञान कहते है । परन्‍तु वैज्ञानिक समुदाय इसे प्राणीयों के विकास एंव उसकी आवश्‍यकता हेतु आवश्‍यक समक्षती है । धर्म शास्‍त्रों में इस अर्जित सूचना को ज्ञान कहते ।    साधु महात्‍मा कहॉ करते है कि ज्ञान प्राप्‍त करते ही जीवन बदल जाता है । कभी कभी मै साध सन्‍यासीयों के प्रवचन आदि सुनने चला जाया करता था । उस समय मैने किसी साधु महात्‍मा के मुंह से सुना था कि ज्ञान प्राप्‍त करो ,तब मै सोचा करता था यह कैसा ज्ञान ? हम सभी के पास ज्ञान है फिर हम पढे लिखे है ,महराज किस ज्ञान की बाते करते है , उस समय मै शायद इस बात को न समक्ष सका ।
       आज हम जो शिक्षा गृहण करते है वह जीवकापार्जन हेतु अत्‍यन्‍त आवष्‍यक है इस ज्ञान के बिना आज के इस युग मे हमारा जीवन चलना संभव नही है यदि इस ज्ञान को हम प्राप्‍त न कर सके तो हमारा पढा लिखा समाज हमें अनपढ ग्‍वार कहता है । इस शिक्षा या ज्ञान में हमें यही सिखलाया जाता है जिससे हम अपने जीवन की आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु धन कमा सकते है । इसलिये स्‍कूल कॉलेज में हम जो शिक्षा गृहण करते है वह एक ऐसा ज्ञान है जिससे हमें जीवकापार्जन हेतु घन की प्राप्‍ती होती है । इस ज्ञान के लिये हम एक व्‍यवस्थित व नियमित शिक्षा का अध्‍ययन एक लम्‍बे समय तक विषय के जानकारों साहित्‍यों के सैद्धान्तिक व प्रयौगिक अध्‍ययन से प्राप्‍त होती है । अत: यह ज्ञान भी अधुरा व एक पक्षीय है इसे हम सम्‍पूर्ण ज्ञान नही कह सकते ।   एक दूसरा ज्ञान ऐसा ज्ञान है जो सम्‍पूर्ण ज्ञान है, जिसके लिये किसी स्‍कूल कॉलेज या गुरू आदि की आवश्‍यकता नही है । यह ज्ञान ईश्‍वर प्रदत्‍त ज्ञान है जिसकी अवहेलना हम करते आ रहे है । यह ज्ञान ईश्‍वर का दिया एक ऐसा ज्ञान है जो सम्‍पूर्ण व सरलता व सहज ज्ञान है । जो आप को सरल सदाचारी व एक पूर्ण आचरण का एक ऐसा व्‍यक्ति बना देता है आप का जीवन सरल ,आनन्‍दमय सुखमय हो जाता है ।  यह ज्ञान स्‍वय मनुष्‍य अपने आप प्राप्‍त कर सकता है र्दशनिक ,विचारण आदि इसे अध्‍यात्‍म ज्ञान भी कहते है । इसे मै स्‍वा ज्ञान कहूंगा । अध्‍यात्‍म ज्ञान के लिये आज बडे बडे अध्‍यात्‍म केन्‍द्र या संस्‍थान आदि खुल गये है ।  विभिन्‍न प्रकार के समुदायों व धर्म आदि का प्रतिनिधित्‍व करते है इस अध्‍यात्‍म समुदायों में भी कही धर्म की तो कही समुदायों व अध्‍यात्‍म ज्ञान की राजनीति किसी न किसी रूप में फल फूंल रही होती है ।
   मै इस विषय में और अधिक चर्चा कर किसी विवादों में उलक्षना नही चाहता ।     मै केवल यहॉ पर इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि यह दूसरा ज्ञान जिसे हम अर्न्‍त आत्‍मा का ज्ञान कहते है ।यह ज्ञान सभी के पास सभी जगह उपलब्‍ध सरल ज्ञान है । इसे कही भी कभी भी बिना किसी शिक्षा व गुरू के प्राप्‍त किया जा सकता है । इस सरल सहज ज्ञान को कही भी किन्‍ही भी परस्थितियों में बिना किस आडम्‍बर व धन व्‍यर्थ किये प्राप्‍त किया जा सकता है । वैज्ञानिक समुदाय कहते है कि मनुष्‍य अपने दिमाक का तीन प्रति शत भाग का ही प्रयोग करता है शेष भाग सुशप्‍तावस्‍था में बेकार रह जाता है अब आप स्‍वय विचार करे कि हम अपने मस्तिष्‍क का केवल तीन प्रतिशत भाग का ही प्रयोग अपने जीवन में करते है शेष बेकार चला जाता है । इसका प्रतिशत कुछ व्‍यक्तियो में धट बढ सकता है A
 स्‍वाज्ञान:- स्‍वा ज्ञान या मनोयोग भी कह सकते है या इसे हम सरल ज्ञान भी कह सकते है क्‍योकि यह ज्ञान अर्न्‍तमन से प्राप्‍त होता है इसे अर्न्‍तआत्‍मा का ज्ञान भी कह सकते है क्‍योंकि यह ज्ञान भी कहॉ जाता है । यही एक पूर्ण व सम्‍पूर्ण ज्ञान है यही सम्‍पूर्ण र्दशन है । जिसके प्राप्‍त होते ही हमें ऐसा महसूस होता है कि हमारे पास कोई दु:ख नही है सुख की अनुभूति होती है हम तनाव मुक्‍त हो जाते है । यही एक ऐसा ज्ञान है जो हमें निर्मल व सरल सदाचारी बनाता है । अध्‍यात्‍म ज्ञान के समुदायों द्वारा बडी बडी बातें व बडे बडे सिद्धान्‍त इस प्रकार से प्रस्‍तुत किये गयें है जिसकी वजह से सामान्‍य मनुष्‍य क्‍या पढा लिखा समाज इसे प्राप्‍त करने के लिये उनकी शरण में आता है कुछ व्‍यक्तियों को यह प्रक्रिया अत्‍याधिक बोझिल व ऊबाउ तथा कठिन लगने के कारण वह इससे दूर ही रहना उचित समझता है । सम्‍प्रदायवाद व धर्मान्‍धता तथा व्‍यवसायिक विचारों ने इसे कठिन बना दिया है । जबकि यह ज्ञान सर्वत्र विद्यमान है सभी के पास है ,सरल है इसे कोई भी व्‍यक्ति कभी भी कही भी बिना किसी साधन व सहायता के प्राप्‍त कर सकता है । यहॉ पर छठी इंन्‍द्रीय या सिक्‍स सेन्‍सेसन के बारे में बतला देना मै उचित समक्षता हूं आप  लोगों ने सुना होगा कि कुछ लोगों के पास सिक्‍स सेन्‍सेसन होता है उन्‍हे यह आभास हो जाता है कि कौन सी घटना या कहॉ पर क्‍या है आदि या पूर्वाभास हो जाता है । यहॉ पर एक उदाहरण और है डिस्‍कवरी या नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर एक कार्यक्रम बतलाया जा रहा था जिसमें एक मंद बुद्धि बालक जो अपना समय बिताने के लिये रेल्‍वे लाईन या सडक के पास बैठ कर आने जाने वाली ट्रेनों को देखा करता था ट्रेनों व वाहनों के आने जाने के क्रम से वह इतना अभ्‍यस्‍थ हो गया था कि वह ऑखे बन्‍द कर यह बतला देता था कि अब कौन सी ट्रेन या वाहन आयेगा उसके द्वारा बतलाई गई बातें बिलकुल सही निकलती थी । इसी प्रकार कई ऐसे भी व्‍यक्ति होते है जिन्‍हे किसी घटनाओं के बारे में पूर्वाज्ञान हो जाता है । विज्ञान के पास भले ही इसके प्रमाण न हो वह भले इसे अवैज्ञानिक व तर्कहीन कहे परन्‍तु इसमें कुछ न कुछ तो है जो वैज्ञानिकों की पॅहूच से दूर है ठीक उसी प्रकार से जैसा कि इस पृथ्‍वीवासीयों ने अभी तक पृथ्‍वी के अतरिक्‍त अन्‍य गृहों पर जीवन को खोजने  में असफल रहे है । इतने बडे आकाश गंगा में जहॉ हमारी पृथ्‍वी से भी कई गुना बडे गृह है वहॉ पर जीवन नही होगा ? यदि है भी तो हमारे वैज्ञानिक व उनका विज्ञान वहॉ तक पहूंचने में असमर्थ रहा है ठीक इसी प्रकार इस ज्ञान की बातों को भले ही वह अस्‍वीकार कर दे परन्‍तु इस ज्ञान के जानकारों द्वारा आज भी ऐसे करिश्‍में किये जाते है जिसे देख कर दुनियॉ मुंह में अंगुलियॉ दबाने पर मजबूर हो जाता है । आप स्‍वंयम इसी प्रकार के कई करिश्‍में आसानी से कर सकते है जिसके परिणाम आप को आप के आशानुरूप ही मिलेगे । परन्‍तु इस विद्या को प्राप्‍त करने के लिये इस पर आप को पूरा पूरा विश्‍वास करना होगा ।
  स्‍वाज्ञान प्राप्‍त करना :- ज्ञान शब्‍द की बात करते ही हमारे मन में एक प्रश्‍न आता है यह प्रश्‍न बार बार मेरे मन में जब जब आता रहा जब मै किसी ज्ञानी व्‍यक्ति साधु संत के मुख से यह सुनता था कि ज्ञान प्राप्‍त करो तभी तुम इस संसार को समक्ष सकते हो । तब मै सोचा करता था कि यह कौन सा ज्ञान है मैने तो विज्ञान से स्‍नातक किया है फिर मुक्षे किस ज्ञान की आवष्‍यकता है यह ज्ञान क्‍या है आदि आदि । वषो बाद जब इस ज्ञान से मेरा परिचय हुआ तो मुक्षे स्‍वंय महसूस हुआ कि यही एक सच्‍चा व सम्‍पूर्ण ज्ञान है जो हमें वर्षो पहले मिल जाना था । परन्‍तु विद्वानों ने कहॉ है कि यह ज्ञान समय आने पर ही किसी किसी को सदगुरू से या स्‍वय आत्‍म चिन्‍तन से आता है , उनकी यह बात बिलकुल सत्‍य है इसमें कोई सन्‍हेह नही है ,कि यह ज्ञान समय पर ही किसी किसी को प्राप्‍त होता है ।  अब यहॉ पर प्रश्‍न उठता है कि इस ज्ञान को कैसे प्राप्‍त किया जा सकता है ? क्‍या इसके लिये हमे किसी सदगुरू या अध्‍यात्‍म संस्‍थानों की शरण में जाना होगा या हमें इसे प्राप्‍त करने हेतु कडी साधना या पूर्व तैयारीयॉ करनी होगी,गृहस्‍थ आश्रम का त्‍याग कर वनवास लेना होगा या किसी मंदिर की शरण में जाना होगा आदि आदि ? कई प्रकार के प्रश्‍न हमारे दिमाक में आते है । इन सभी प्रश्‍नों का एक सीधा सा उत्‍तर है ,यह ज्ञान सरल है जो अर्न्‍तरात्‍मा से जिसे हम अर्न्‍तमन कहते है A इसके लिये जैसा कि हमने पहले ही कहॉ है कि किसी साधना किसी प्रकार के क्रिया कलाप की आवश्‍यकता नही है इसे प्राप्‍त करने के लिये आप निम्‍न सूत्रों का पालन करे यह ज्ञान स्‍वंयम आ जायेगा ।     1- इस विद्या पर पूर्ण विश्‍वास :- अत्‍म ज्ञान व आत्‍म ज्ञान प्राप्‍त के चमत्‍कारों को प्राप्‍त करने के लिये सर्वप्रथम इस पर पूरी तरह से विश्‍वास करना होगा । यदि आप इस आत्‍म चिन्‍तन के विषय का ज्ञान प्राप्‍त करना चाहते है तो सर्वप्रथम इसकी सरल एंव छोटी छोटी उपेक्षित कही जाने वाली बातों को प्राथमिकता देना होगी । इसके बडे ही आशानुरूप ,सुखद व दूरगामी परिणाम मिलते है ।
2-सरल जीवन  :- उपरोक्‍त सूत्र के पालन के बाद दूसरे सूत्र का नम्‍बर आता है इस ज्ञान को प्राप्‍त करने के लिये सरल जीवन जीने का प्रयास करना होगा ।जीवन में जितनी सहजता व सरलता होगी आप का जीवन निर्विवाद होगा । सरलता से तात्‍पर्य प्राकृतिक के सरल रास्‍तों पर चलने से है । आप अपने दैनिक जीवन में एकदम परिवर्तन नही कर सकते । चूंकि आप की सोच व कार्य व्‍यवहार सभी कुछ वर्षो से निरंतर चले आ रहे होते है और इन कार्यो में आप अभ्‍यस्‍थ हो चुके होते है । इसलिये यदि आप असत्‍य बोलते है तो कोशिश करे कि इसमें जहॉ तक हो सके ऐसा झूठ न बोले जिससे आप का काम न चले । यह प्रयास करे कि जहॉ तक इससे बचा जाये बचे । यह एक उदाहरण है इसी प्रकार के और भी ऐसे कार्य जो आप को लगे यह गलत है और इससे हमें नही करना था ऐसे कार्यो से जहॉ तक बचा जाये बचने का प्रयास करे । एकदम नही तो धीरे धीरे करें । आप देखेगे आप के द्वारा छोडे गये बुरे कार्य जिन्‍हे हम कठिन कार्य कहते है कम होने लगते है । जीवन सरल होने लगता है जैसाकि आप भी इस बात को जानते है कि एक झूठ को छिपाने के लिये कई झूठ बोलना पडता है यदि वह झूठ पकडा गया तो र्शमिन्‍दा होना पढता है एंव दुसरों की नजर में हमेशा के लिये हमारी पहचान झूठ बोलने वाले की हो जाती है । इसलिये ऐसा कार्य न करे जिससे असुविधा हो या आप का जीवन आप का व्‍यवहार कठिन बने । अत: कुछ ऐसे कार्य जिसे करने पर आप को यह बोध हो कि यह कार्य ठीक नही है उसके बारे में विचार करे एंव उसे छोडने का प्रयत्‍न करे । ऐसा अभ्‍यास करने से हर प्रश्‍नों के बुरे भले का ज्ञान व उसके परिणामों से आप भली भॉती अवगत होते जायेगे व आप पहले जितना गलत कार्य करते थे धीरे धीरे उसमें  कमी आने लगेगी आपको अपने जीवन में बदलाव महसूस होगा ।
3:- स्‍वंय चिन्‍तन :- इसका तीसरा सौपान है स्‍वंय विचार करना अर्थात स्‍वचिन्‍तन आप व्‍यस्‍थ तो है परन्‍तु अव्‍यवस्थि है ,क्‍या करना है ,क्‍या कर रहो हो ? क्‍यों कर रहे हो यह आप को पता ही नही है । इसके बाद भी अपने आप को अत्‍याधिक व्‍यस्‍थ रखते हो मानसिक तनावों का शिकार होते हो । इस पर भी चिन्‍तन करे ,हम कहते है हमारे पास समय नही है काम अधिक है ,तो यह आप का भ्रम है , आप के पास काम के बीच में ही इतना समय है कि आप कार्य करते हुऐ भी चिन्‍तन या विचार तो अवश्‍य ही कर सकते है । अब यहॉ प्रश्‍न है कि मै क्‍या चिन्‍तन करू , क्‍या विचार करू, ?
इन विचारों के लिये शान्‍त जगह व समय होना चाहिये इसके बाद विषय जिस पर चिन्‍तन या विचार किया जाये ? तो यह आप का सोचना गलत है ,जैसा कि हमने बार बार लिखा है कि यह ज्ञान सरल व सभी जगहों पर उपलब्‍ध है । अत: आप अपने दैनिक कार्यो को करते हुऐ इस पर केवल विचार करे ,व आप पूछेगे कि विषय क्‍या होगा जिसपर विचार किया जाये ,तो यही प्रश्‍न यहॉ पर सबसे महत्‍वपूर्ण है कि हमारे चिन्‍तन का विषय क्‍या होगा ? चिन्‍तन का विषय आप को स्‍वंय अपने कार्यो से मिलेगा ,हर चिन्‍तन का विषय आप चाहेगे तो आप को अपने आप मिलता जायेगा ,बस आप को उन विषयों पर मनन करना है । यही से आप के अध्‍यात्‍म ज्ञान की शुरूआत प्रारम्‍भ हो जायेगी आप का विषय स्‍वंय आप को उसके बुरे व भले पक्ष से अवगत कराता चला जायेगा । इतना ही नही इसके अचूक परिणाम भी आप को मिलते चले जायेगे । आप का मन प्रशन्‍न व आत्‍म शक्ति का आप को अहसास होता जायेगा । यहॉ पर चिन्‍तन के हजार उदाहरण दिये जा सकते है परन्‍तु आप स्‍वंय अपने दैनिक कार्यो के दौरान ऐसी समस्‍याओं पर मनन करे तो अधिक उपयुक्‍त होगा । क्‍योकि हर मनुष्‍य व उनकी परस्थितीयों के अनुसार समस्‍यें अलग अलग हुआ करती है । जैसे आप किसी से बुरा बोलते है व अपना काम निकालते है या समाज के बनाये नियमों का उलंधन करते है । कानून तोडने का कार्य करते है या फिर गलत कार्य नही भी करते परन्‍तु आप की अर्न्‍त आत्‍मा उस कार्यो को करने के लिये आप को रोकती है या बतलाती है कि यह गलत कार्य है ,तब आप का विषय आप को मिल गया होता है आप को इस विषय पर केवल विचार करना है यदि सामर्थवान थे तो क्‍या समाज के बनाये नियमों को तोडना हमारे लिये जरूरी था या कानून को तोडे बिना भी यदि कोई कार्य किया जा सकता था तो फिर उसे हमने क्‍यो तोडा इस पर केवल और केवल चिन्‍तन करे ,चिन्‍तन के लिये किसी पूर्वनिर्धारित विषयों की आवश्‍यकता नही है । यह विषय आप की परस्थितियों व आप के व्‍यवहारों तथा विचारों के अनुरूप स्‍वंय आप के पास एक प्रश्‍न बन कर उपस्थित हो जायेगा एंव इसका उत्‍तर स्‍वंय आप को चिन्‍तन या मनन करने से प्राप्‍त होगा । चिन्‍तन या मना जिसे अध्‍यात्‍म की भाषा में आत्‍म चिन्‍तन कहॉ जाता है इसे ही अर्न्‍तध्‍यान ,मनोयोग ,स्‍वाचिन्‍तन कहॉ जाता है ।


                                डॉ0 कृष्‍ण भूषण सिंह चन्‍देल
                             वृन्‍दावन वार्ड गोपालगंज सागर म0प्र0
                         http://krishnsinghchandel.blogspot.in
                     ई मेल- krishnsinghchandel@gmail.com
                                                       
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